सतनामी व 1672 में औरंगजेब के विरुद्ध आत्म सम्मान की लड़ाई एवं वर्तमान स्थिति
Abstract
सतनाम सत (सत्य) और नाम (ईश्वर का नाम)। जो लोग सत्य को ही ईश्वर मानते हैं और उसी की उपासना करते हैं, वह सतनामी माने जाते हैं।
सतनाम विचारधारा का विकास भक्ति आंदोलन के निर्गुण विचारधारा से हुआ है।
01) यह ईश्वर को निराकार मानते हैं।
02) यह मूर्ति पूजा की अपेक्षा नाम सिमरन और भक्ति को महत्व देते हैं ।
03) यह विचारधारा बाहरी आडंबरों से हटकर सत्य, श्रद्धा, समानता और आंतरिक भक्ति पर जोर देती है। इनका मानना है कि ईश्वर बाहर नहीं बल्कि मन के अंदर है।
कबीर जी ,नानक जी, रविदास जी भक्ति युग के संत हुए हैं। जिन्होंने 15वीं 16वीं शताब्दी में नए धार्मिक (सतनाम )रास्ते को बनाया। सतनाम विचारधारा, जो हिंदू धर्म व इस्लाम धर्म दोनों से अलग है। सतनामी विचारधारा की सरलता के कारण हिंदू धर्म व इस्लाम धर्म के अनुयाई इसमें शामिल हो रहे थे। भक्ति आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसने आध्यात्मिक ख्याति प्राप्त की ,यद्यपि इसमें ईश्वर के प्रति प्रेम और साधना का सिद्धांत मूल रूप से हिंदू था। यह विचारधारा इस्लामी प्रथ।ओ एवं विश्वासों से भी प्रभावित थी ! भक्ति आंदोलन के दो उद्देश्य रहे हैं-