हिंदी साहित्य में वर्णित भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्य

Authors

  • डॉ. राधा भारद्वाज Author

Abstract

संस्कृति को मानव जीवन के मानसिक, नैतिक, भौतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक, कलात्मक तथा व्यावहारिक पक्षों की समग्र अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ सीखता है, अपनाता है और व्यवहार में लाता है, वही संस्कृति का निर्माण करता है। संस्कृति का वास्तविक क्षेत्र समाज है, क्योंकि मनुष्य समाज में रहकर ही अपने आचार-विचार, व्यवहार, परंपराएँ, मान्यताएँ और जीवन-मूल्य विकसित करता है। इस दृष्टि से समाज का संपूर्ण क्रियाविधान संस्कृति की रचना करता है। मानवीय स्तर पर इन क्रियाविधियों को संस्कार कहा जाता है। मनुष्य और प्रकृति दोनों मिलकर संस्कारों की रचना करते हैं। प्रकृति मनुष्य को जीवन का आधार प्रदान करती है, जबकि मनुष्य अपने अनुभव, चिंतन और व्यवहार के माध्यम से जीवन-पद्धति का विकास करता है। आचार, विचार और संस्कार संस्कृति के प्रमुख अंग माने जाते हैं। देह और इंद्रियों से उत्पन्न होने वाली क्रियाएँ ‘आचार’ के अंतर्गत आती हैं, जबकि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आदि के द्वारा की गई चेष्टाएँ जब मानवीय चेतना में स्थायी प्रभाव उत्पन्न करती हैं, तब वे संस्कार का रूप धारण कर लेती हैं।

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Published

2000

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Section

Articles