हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गायन के परिर्वतित आयाम
Abstract
हिंदुस्तानी संगीत हमारे जीवन का सुंदर संश्लेषण है, भारतवर्ष की संस्कृति का परिचायक है और भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। भारतीय साहित्य और भारतीय कला के समान भारतीय संगीत भी शताब्दियों की अमूल्य देन है। कला कोई भी हो यदि वह परंपरागत नहीं है तो वह अजायबघर की वस्तु ही कहलाएगी। संगीत के इतिहास में कला प्रस्तुत करने के लिए तत्संबंध नियमों का अनुसरण आवश्यक है। कला सौंदर्य उपासना का सजीव प्रतीक और उसका अमर माध्यम है। संगीत कला मुख्यतः प्रयोगात्मक कला है तथापि उसका शास्त्रीय पक्ष भी उपेक्षनीय नहीं। शास्त्र से अभिप्राय अध्धेय विषय की वैज्ञानिक व्यवस्था से है जिसके माध्यम से अनुशासन के साथ शिक्षा की सुविधा संपन्न हो सके। शास्त्र का कार्य निगमात्मक प्रणाली से सिद्धांतो की स्थापना कर कला को स्थायित्व तथा प्रतिष्ठा प्रदान करना है। लक्ष्य तथा लक्षण में सामंजस्य स्थापन शास्त्र का प्रधान उददेश्य है। शासन से अभिप्राय केवल नीरस एवं निष्प्राण नियमों के तार्किक प्रतिपादन मात्र से नहीं अपितु कला की चिरंतनता बढ़ाने वाले तत्व चिंतन से है। ‘‘नादरूपो जनार्दन कला’’ का बीज मंत्र कला की इसी प्रवाहिता को संयत रखने का कार्य शास्त्र का है। कला का वही प्रवाहित शास्त्र सम्मत हो सकता है जो कला के मौलिक सिद्धांतो के विपरीत ना होते हुए जन रूचि के अनुकूल हो।